आरंग

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आरंग एक प्राचीन नगरी है | इसकी प्राचीनता वहाँ पर स्थित अति प्राचीन मंदिरो मूर्तियों मंदिरो में महीन नक्कासी और ताम्र पत्र अभिलेखों से प्राप्त होती है| आरंग महाभारत कालीन महान धर्म निष्ठ राजा मोरध्वज की नगरी थी उसने अपने शासन काल में  अनेक मंदिर का निर्माण कराया था जिसके अवशेष अभी भी मिलते है| वैसे तो आरंग में अनेक मंदिर है ,पर सबसे ज्यादा मुख्य रूप से शिवलिंग को देखा जाता है| उसमे से मुख्य रूप से मंदिर भाण्डल देवल मंदिर ,बाघ देवल मंदिर ,महामाया माता मंदिर ,चंडी माहेश्वरी मंदिर ,पंचमुखी महादेव ,पंचमुखी हनुमान मंदिर मुख्य रूप से है| इनमे से सबसे प्राचीन भाण्डल देवल मंदिर को कहा जा सकता है|यह मंदिर भाण्डल देवल नाम से विख्यात है| यह जैन धर्म को समर्पित है |मंदिर के गर्भ में अति तीन तीर्थकर की अति सुन्दर चमक कायोत्सर्ग मुद्रा वाली प्रतिमाए अधिष्ठित है| तथा आधारविन्यास में पंचरथकार है| नगरशैली में निर्मित इस मंदिर के मंडप एवं मुख मंडल का आधार से ऊपर का भाग विनष्ट हो चूका है| महानदी के तट पर स्थित आरंग   एक प्राचीन, पौराणिक तथा ऐतिहासिक नगरी है। प्राचीन काल में यहाँ पर कलचुरी नरेश मोरध्वज का राज्य था। मोरध्वज का एक ही पुत्र ताम्रध्वज था जिसे श्री कृष्ण ने मोरध्वज को आरा से चीरने का आदेश दिया था। इसीलिये इस नगरी का नाम आरंग पड़ा। रायपुर जिले में सिरपुर तथा राजिम के बीच महानदी के किनारे बसे इस छोटे से नगर को  मंदिरो की नगरी कहते हैं। यहां के प्रमुख मंदिरों में 11वीं-12वीं सदी में बना भांडदेवल मंदिर है। यह एक जैन मंदिर है। इसके गर्भगृह में तीन तीर्थकरों की काले ग्रेनाइट की प्रतिमाएं हैं। महामाया मंदिर में 24 तीर्थकरों की दर्शनीय प्रतिमाएं हैं। बाग देवल, पंचमुखी महादेव, पंचमुखी हनुमान तथा दंतेश्वरी देवी मंदिर यहां के अन्य मंदिर हैं जो दर्शनीय हैं बागेश्वर नाथ महादेव मंदिर को सिद्धपीठ भी कहा जाता है




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