चम्पारण

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संत वल्लभाचार्य मन्दिर छत्तीसगढ़ राज्य में रायपुर से लगभग 60 किमी दूर चम्पारण गाँव में स्थित है।

इस मंदिर का निर्माण पुष्टि मार्ग (वल्लभ संप्रदाय) के संस्थापक संत वल्लभाचार्य के सम्मान में किया गया था। यह विशाल मंदिर चाँदी के बड़े-बड़े दरवाजों से सुसज्जित है। यहाँ मंदिर के प्रांगण में एक संग्रहालय भी है। वल्लभाचार्य मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर चम्पकेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है।

महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्म स्थली होने के कारण चम्पारण की धार्मिक महत्ता है और इसे एक पावन धार्मिक स्थल माना जाता है। इस गांव को स्थानीय भाषा में ‘चम्पारण्य’ भी कहा जाता है। संत वल्लभाचार्य के सम्मान में एक वार्षिक मेले का आयोजन चम्पारण में होता है और वरुथिनी एकादशी के दिन बहुत ही श्रद्धा के साथ मंदिर में उनका जन्म दिवस मनाया जाता है।मंदिर में नित्य पूजा के अलावा विभिन्न विशेष पूजा और अनुष्ठान भी संपन्न होते हैं। यहाँ हिन्दुओं के लिए निर्धारित उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत संस्कार) भी किया जाता है|  महाप्रभु वल्लभाचार्य जी पुष्टि संप्रदाय के प्रवर्तक माने जाते हैं। चम्पारण उनका प्राकट्य धाम होने के कारण पुष्टि संप्रदाय के लोग इस स्थल को सर्वश्रेप्ठ पवित्र भूमि मानते हैं। कहते हैं कि महाप्रभु ने अपने जीवनकाल में तीन बार धरती की पैदल परिक्रमा की। परिक्रमा के दौरान उन्होंने देश के 84 स्थानों पर श्रीमद् भागवत कथा का पारायण किया। इन स्थानों को पवित्र भूमि माना जाता है उनमें से एक चंपारण भी है। चूंकि यह प्राकट्य स्थल भी है इसलिए यहां का महत्व सबसे ज्यादा है।  वल्लभाचार्य के माता-पिता लगभग 550 साल पहले बनारस से मुगल साम्राज्य में हो रहे अत्याचार के कारण पदयात्रा करते हुए चम्पेश्वर धाम में आए थे। महाप्रभु के पिता का नाम श्री लक्ष्मण भट्ट तथा माता का नाम श्रीमती इल्लमा गारू था। बताते हैं माता इल्लमा गारू को अष्ट मासा प्रसव हुआ।इसी परिसर में महाप्रभु वल्लभाचार्य का भव्य मंदिर है वे इसी स्थल पर प्रकट हुए थे।




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