वनदेवी अंगारमोती करती हैं मनोकामना पूर्ण

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धमतरी। वन देवी मां अंगारमोती अंगिरा ऋ षि की पुत्री है। जिनका आश्रम सिहावा के पास घठुला में हैं। देवी का मंदिर वर्तमान में गंगरेल बांध के तट पर वन क्षेत्र में स्थित है। यहां पर दूर-दूर से भक्त मनोकामना पूर्ण करने के लिए आते हैं। देवी का मूल मंदिर वनग्राम चंवर, बटरेल, कोरमा और कोकड़ी की सीमा पर महानदी व सूखा नदी के पवित्र संगम पर स्थित है।

यहां देवी कैसे पहुंची, इसका इतिहास कोई नहीं जानता। पर पुजारी देव सिंह ध्रुव के अनुसार 7 पीढ़ियों से उनका परिवार देवी की सेवा कर रहा है। देवी का इतिहास मां विंध्यवासिनी देवी के समकालीन माना जाता है। कहा जाता है सप्त ऋषियों के आश्रम से जब दोनों देवियों निकलकर अपने-अपने स्थान पर प्रतिष्ठित हुई। तब महानदी के उत्तर दिशा में धमतरी शहर की ओर देवी विंध्यवासिनी का और महानदी के दक्षिण दिशा में नगरी-सिहावा की ओर देवी अंगारमोती का अधिकार क्षेत्र निर्धारित हुआ। चंवर से सन्‌ 1937 में देवी की मूल प्रतिमा चोरी हो गई। पर चोर उनके चरणों को नहीं ले जा सका। जो आज भी मौजूद है। चोरी के देवी की नई प्रतिमा मूल चरणों के बगल में स्थापित की गई। सन 1976 में जब गंगरेल बांध बनकर तैयार हो गया, तब चंवर समेत आसपास के दर्जनों गांव डूब में आ गए। जिसमें देवी का मंदिर भी शामिल था। अतः विधिविधान के साथ वहां से हटाकर गंगरेल बांध के वर्तमान स्थल पर उनकी प्राण प्रतिष्ठा की गई। यहां देवी की प्रतिमा विशाल वृक्ष के नीचे बने चबूतरे पर स्थापित है और वनदेवी होने के कारण उनकी पूजा खुले स्थान पर ही होती है। माता की महिमा का ही प्रताप है कि अब चारभाठा, गीतपहर, अंवरी, माकरदोना, हटकेशर समेत कई अन्य स्थानों पर भी भक्तों ने मंदिर बनाकर उनकी पूजा-अर्चना शुरु कर दी है। दीपावली के बाद प्रथम शुक्रवार को देवी के मंदिर में विशाल मड़ई(मेला) होती है। जिसमें विभिन्न गांवों के देवी-देवताओं समेत हजारों लोग जुटते हैं। चैत्र व शारदीय नवरात्र पर यहां श्रद्घा का सैलाब उमड़ पड़ता है।




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