Maa Vindhvasini, Dhamtari | Mor Chhattisgarh

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मां विंध्यवासिनी धमतरी

देश में स्थापित लगभग सभी मंदिरों में भगवान की मूर्ति के दर्शन मुख्यद्वार से सीधे हो जाते है। लेकिन धमतरी शहर की आराध्य देवी मां विंध्यवासिनी जिन्हें बिलाई माता ने नाम से जाना जाता है यहां गर्भगृह में देवी की मूर्ति तिरछी स्थापित है।

ऐसा नहीं है कि मंदिर का निर्माण मूर्ति स्थापना बाद जानबूझकर तिरछा करवाया गया हो, न ही मंदिर बनने के बाद मूर्ति की तिरछी स्थापना की गई है। जिस समय मंदिर का निर्माण हुआ उस समय जमीन से निकली देवी की प्रतिमा पूरी तरह बाहर नहीं आई थी। मंदिर निर्माण के बाद जब कालांतर मूर्ति बाहर आई तो मूर्ति मंदिर के मुख्य द्वार से थोड़ी तिरछी नजर आती है।

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मंदिर के पुजारी भीखमचंद शुक्ल ने बताया कि मां विंध्यवासिनी माता के संबंध में दो कथा प्रचलित है। इसमें से एक कथा के अनुसार वर्तमान में जहां आज देवी का मंदिर है आदिकाल में वहां घनघोर जंगल हुआ करता था। राजा मांडलिक अपने सैनिकों के साथ एक बार इसी जंगल में गए। इस स्थान पर आते ही घोड़े ठिठक गए। इसके चलते राजा को वापस लौटना पड़ा। दूसरे दिन भी यही घटना हुई। घोड़े उसी स्थान पर आकर रुक गए, तब राजा ने सैनिकों को जंगल में और अंदर जाकर देखने का आदेश दिया। सैनिकों ने जब जंगल में खोजबीन की तो उन्होंने देखा कि एक पत्थर के चारों ओर जंगली बिल्लियां बैठी हैं। राजा को इसकी सूचना दी गई। राजा ने बिल्लियों को भगाकर उस पत्थर को प्राप्त करने का आदेश दिया। चमकदार व आकर्षक पत्थर जमीन के अंदर तक धंसा हुआ था। काफी प्रयास के बाद भी पत्थर बाहर नहीं निकला। इस दौरान उसी स्थान से जलधारा निकलना प्रारंभ हो गई। खुदाई को दूसरे दिन के लिए रोक दिया गया। उसी रात्रि देवी मॉं ने राजा को स्वप्न दिया कि पत्थर को उस स्थान से मत निकालो। उसकी पूजा पाठ करना कल्याणकारी होगा। राजा ने उस स्थान पर चबूतरे का निर्माण कराकर देवी की स्थापना करा दी। कालांतर में इसे मंदिर का स्वरूप दे दिया गया।

स्वमेव तिरछी हुई देवी मां की प्रतिमा

लोगों का ऐसा मानना है कि मंदिर में पत्थर अधिक ऊपर नहीं आया था। प्रतिष्ठा के बाद देवी की मूर्ति स्वयं ऊपर उठी। आज भी इसका प्रमाण दिखाई देता है। क्योंकि पहले जिस द्वार का निर्माण किया गया था, वहां से देवी का सीधा दर्शन होता था। उस समय मूर्ति पूर्ण रूप से बाहर नहीं आईं थी, पर जब पूर्ण रूप से बाहर आई तो चेहरा द्वार के बिल्कुल सामने नहीं आ पाया था। मूर्ति का पत्थर काला था। मां विंध्यवासिनी की मूर्ति भी काली थी और मूर्ति के साथ काली बिल्लियां भी देखी गई थीं, इसलिये लोग इन्हें बिलाईमाता भी कहने लगे। जो आज भी प्रचलन में हैं।

काले पाषाण में बदली विंध्यवासिनी

दूसरी जनुति के अनुसार अयोध्या के राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिये अपने कुल पुरोहित के आज्ञानुसार मंत्री सुमंत को सिंहावा पर्वत पर स्थित ृंगी ऋषि आम ऋषियों को आमंत्रण देने भेजा। मुनि जब राजा के निमंत्रण पर अयोध्या के लिए आने लगे तो उसी समय वहां तपस्यारत विंध्याचल पर्वत राजा की पुत्री विंध्यवासिनी भी मुनियों के साथ आने लगी। मुनियों ने उन्हें अपने साथ आने की आज्ञा नहीं दी। इसके बाद भी विंध्यवासिनी चुपके-चुपके पीछे-पीछे आती रही। जब मुनियों की नजर फिर पड़ी तो उन्होंने देवी विंध्यवासिनी को वहीं पर रुक जाने कहा। साथ ही कहा कि आपका यहां रहना कल्याणकारी होगा। उसी समय विंध्यवासिनी काले पाषाण के रूप में परिवर्तित हो गईं। तब से उनकी पूजा-अर्चना की जा रही है। अरसे बाद गोड़ नरेश धुरवा ने मंदिर का निर्माण कराया।




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