Madku Dweep

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बिलासपुर शहर से 39 किमी दूर बैतलपुर के पास शिवनाथ के बीचों-बीच पर्यटन की अनूठी जगह मदकू द्वीप। इससे अहम कि यह दो धर्म और आस्था का संगम स्थल है। सदानीरा शिवनाथ की धाराएं यहां ईशान कोण में बहने लगती हैं। वास्तु शास्त्र के हिसाब से यह दिशा सबसे पवित्र मानी जाती है।
मदकूद्वीप में राष्ट्रीय मसीही मेले का इस साल 107 वां वर्ष था। इस मौके पर सैकड़ों पादरियों व मसीही भक्तों ने मेले में एक से सात फरवरी तक शिरकत की। चारों ओर पानी से घिरे इस टापू में सुबह पांच बजे ही प्रभात फेरी निकलती थी। संगीत की धुन के साथ भजन गाते लोग पूरे टापू का परिक्रमा करते थे।
24 हेक्टेयर में फैले मदकू द्वीप के पास ही एक और छोटा द्वीप 5 हेक्टेयर का है। दोनों बीच टूरिस्ट बोटिंग का आनंद ले सकते हैं। जैव विविधता से परिपूर्ण द्वीप में माइक्रो क्लाइमेट (सोला फॉरेस्ट) निर्मित करता है। यहां विशिष्ट प्रजाति के वृक्ष पाए जाते हैं। इसमें चिरौट (सिरहुट) के सदाबहार वृक्ष प्रमुख हैं।1959-60 की इंडियन एपिग्राफी रिपोर्ट में मदकू द्वीप से प्राप्त दो प्राचीन शिलालेखों का उल्लेख है। पहला लगभग तीसरी सदी ईस्वी की ब्राह्मी लिपि में अंकित है। इसमें किसी अक्षय निधि का उल्लेख किया गया है। दूसरा शंखलिपि में है। दोनों भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्कालीन दक्षिण पूर्व मंडल कार्यालय विशाखापट्नम में रखे गए हैं।शिवनाथ नदी के पानी से घिरा मुंगेली जिले में स्थित मदकू द्वीप आम तौर पर जंगल जैसा ही है। शिवनाथ नदी के बहाव ने मदकू द्वीप को दो हिस्सों में बांट दिया है। एक हिस्सा लगभग 35 एकड़ में है, जो अलग-थलग हो गया है। दूसरा करीब 50 एकड़ का है, जहां 2011 में उत्खनन से पुरावशेष मिले हैं। जिसे मदकू द्वीप कहते हैं।ऐसी मान्यता है कि मंडूक ऋषि ने यहीं पर मंडूकोपनिषद की रचना की थी. उन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम मंडूक पड़ा. यहां खुदाई में कुछ ऐसे अवशेष मिले हैं, जो 11वीं शताब्दी के कल्चुरी कालीन मंदिरों की श्रृंखला से मिलते-जुलते हैं|




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