तुरतुरिया

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sita mata

 

 

तुरतुरिया घने वन और प्रकृतिक छटाओं से आच्छादित छत्तीसगढ़ का प्रमुख धार्मिक सांस्कृतिक और पर्यटन का केंद्र है जहां विराजित हैं ऐसा माना जाता है कि तुरतुरिया ही वह स्थान है जहां रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मिकी जी का आश्रम और लव-कुश की जन्मस्थली हैI मातागढ़ माँ काली की यह मूर्ति पांचवी शताब्दी की मानी जाती हैI वहीं साल 1914 से यहां पौष पूर्णिमा यानी (छेरछेरा पुन्नी) के दिन मेला लगता है जिसकी भव्यता देखते ही बनती हैI इतना ही नहीं यहां सालभर भक्तों की भारी भीड़ देखी जाती हैI
तुरतुरिया छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 130 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैI जहां रायपुर से संबलपुर यानी राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 53 पर 70 किलोमीटर पर ग्राम कुहरी से बाईं ओर सिरपुर होकर एवं राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 53 से ही ग्राम पटेवा लगभग 80 किलोमीटर से बाईं ओर से बरनवापारा होकर भी तुरतुरिया जाया जा सकता है इस स्थल का नाम  तुरतुरिया पडने का कारण यह है कि बलभद्री नाले का जलप्रवाह चट्टानो के माध्यम से होकर निकलता है तो उसमे से उठने वाले बुलबुलो के कारण तुरतुर की ध्वनि निकलती है। जिसके कारण उसे तुरतुरिया नाम दिया गया है। इसका जलप्रवाह एक लम्बी संकरी सुरंग से होता हुआ आगे जाकर एक जलकुंड में गिरता है जिसका निर्माण प्राचीन ईटों से हुआ है। जिस स्थान पर कुंड में यह जल गिरता हैlवहां पर एक गाय का मोख बना दिया गया है जिसके कारण जल उसके मुख से गिरता हुआ दृष्टिगोचर होता है। गोमुख  के दोनो ओर दो प्राचीन प्रस्तर की प्रतिमाए स्थापित है जो कि विष्णु जी की है इनमे से एक प्रतिमा खडी हुई स्थिति में है तथा दूसरी प्रतिमा में विष्णु जी को शेषनांग पर बैठे हुए दिखाया गया है। कुंड के समीप ही दो वीरो की प्राचीन पाषाण प्रतिमाए बनी हुई है जिनमे क्रमश: एक वीर एक सिंह को तलवार से मारते हुए प्रदर्शित किया गया है तथा दूसरी प्रतिमा में एक अन्य वीर को एक जानवर की गर्दन मरोडते हुए दिखाया गया है।




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